पीड़ा

पीड़ा

जब तुम आ जाती हो
उस असहनीय पीड़ा में

मैं देखता हूँ अपनी कल्पनाओ से
देह तुम्हारी सारी जकड़ी रहती है

मुख तुम्हारा एक उखड़ा रहता है
धर्म की आड़ में , मंदिर से तुम्हे भगाया जाता है

बार बार तुम्हे उस पीड़ा का एहसास कराया जाता है
तब मैं देखता हूँ अपनी कल्पनाओ से

की मैं अगर तुम्हारी जगह होता
तो क्या यह पीड़ा मैं सहन कर पाता

क्या हर माह मैं यह यातना सह पाता
खुद को दुनिया से कितना मैं छुपाता

स्त्री के भेष में क्या मैं माहवारी को
सहन कर पाता

मैं संग हूँ तुम्हारे मैं वो पुरुष नही अब
मैं तुम्हारे संग चलना चाहता हूँ

साथ तुम्हारे मैं किसी स्टोर से
पैड वो खरीदना चाहता हूँ

हाथ थाम तुम्हारा मैं
शांत समुन्द्र किनारे टहलना चाहता हूँ

जो लगे हो सड़क किनारे वो चाट के ठेले
मैं हाथ थाम तुम्हारा वो पानी पूरी खाना चाहता हूँ

मुझे एहसास है उस पीड़ा का
मैं पीरियड मे भी तुम्हारी एक परछाई बनना चाहता हूँ

मैं अब वो पुरुष नही
मैं वो असहनीय पीड़ा भोगना जानता हूँ

लेखक :- अजनबी राजा

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लौट आओ ना…

अंधेरा हो गया हैं
सुनो ना
थाम लो ना हाथ तुम मेरा
तुम्हारो उन वादों में यह भी था ना
पसन्द नही ना तुम्हे यह रात
चलो सुबह के इंतजार में
मेरी गोद में सो जाओ ना
उस दिन की तरह
हर तस्वीर तुम्हारी मेने
अब छुपा रखी हैं
ख्वाब सारे सिरहाने रखे हैं
चले आओ ना फिर से
इस बार तो शहर भी भीगा नहीं
बारिशें भी इंतजार में है तुम्हारे
बेशक तुम लौट जाना उस दिन की तरह
पर बताओ जरा
वादे पूरे नही होते फिर
किए क्यू जाते हैं ….?
मैं तो कुछ भी ना थी
सब तुम्हारा ही रह गया मुझ में
फिर बताओ ना तुम
यह सब कहानियाँ अब
किस के लिए लिखते
अच्छा हुआ तुम लिख लेते हों
पर मैं
बस खामोशियाँ पसरी रहती हैं अब यहाँ
तुम्हारी वो डायरी
अभी भी वेसी ही हैं
बस ..
कुछ पन्ने भीग जाते है हर रोज अश्को से
अंधेरा घना हो जाता हैं
पर मैं लाईट्स जलाए रखती हूँ
की तुम आओगे
और तुम्हे पसंद है उजाला ….

अजनबी राजा

एक बन्द कमरा

कमरा …..
एक भरा कमरा पड़ा हैं
कुछ रफू किए हुए कपड़ो से
कुछ रफू किए हुए रिश्तों से
दीवारे जिस पर आई हुई है सीलन
कई सालों की
कुछ किले जंगी लगी हुई
जिन पर टंगी हैं तस्वीरें कुछ टूटे काँच वाली
चारों कोनों में घर बने हैं उस मकड़ी के
और उन्ही घरों में कई लाशें लटकी हुई हैं उन पतंगों की जो आ तो गए पर जा ना सके
उन्ही के बीच दम तोड़ती
कुछ आहें भरती हुई
खुद को ही गले लगाती हुई
खुद ही आँसू पोछती हुई
रौशनदान से आती हुई रौशनी
से खुद को छुपाती हुई
अंधेरे में खुद को सहज पाती हुई
चाँद को चुपके से देखती हुई
सितारों में खुद को ढूंढती हुई
बारिश में तड़प उठती हैं जो भीगने को
बसन्त में भाते हैं जिसको फूल किसी गुलदस्ते में
हाथ थामे खुद को उसकी बाहों में समेटे हुए
एक मोहब्बत कल रात दम तोड़ गई
उसके अब्बू ना माने थे
इसके पिताजी पंडित निकले ………..

और वो कमरा बन्द हैं सदियों से 😔😔

©
अजनबी राजा

गुड़िया

” गुड़िया ”
देह की सारी रक्त शिराओं से
रक्त उसका बह गया
अबोध , मासूम , चहकती थी जो
कोई आज निर्जीव उसे कर गया
हवस की भूख उम्र को देख ना सकी
साठ से होते होते सात पर आ रुकी
कल तक जो देख रही थी जहाँ
निढाल होती आँखे उसकी
आज छत पर है टिकी
माँ खड़ी है एक ओर
पिता लाचार हैं
कोख है चीख रही
क्या यही तेरा संसार हैं
“गुड़िया” कहते कहते सचमुच
गुड़िया बना गए
आँख है पसरी उसकी
देह हो रही एक जिंदा लाश हैं
खबर लगी जो लोगों को
पहले बात पूछी धर्म की
जान कर रंग उसका भगवा
रंग रंग में रक्त की है आग लगी
सियासत हो रही , देख रही हैं वो निर्जीव
कोख में ही मार देती “माँ”
गर औरत है यहाँ बिस्तर की नींव ….

लेखकः अजनबी राजा __

पिता ….

मेरी बढ़ती उम्र
उनकी ढलती उम्र
मैं होता जवां
वो होते बूढ़े

ख्वाहिशें मेरी बढ़ती हुई
उम्मीदें उनकी मुझसे छत चढ़ती हुई
उनके माथे पर बढ़ती झुर्रियाँ
मेरे माथे पर बढ़ता तेज

कुछ इस तरह से
वो ढ़लते गए
मैं निखरता गया

वो खड़े रहें बरगद की तरह
मैं उनकी छाव तले खुद को गढ़ता गया
वो घर
मैं उनके आँगन का सितारा बनता गया

लेखकः अजनबी राजा

एक दिन….

एक दिन …….
चलते हुए जो मैं कभी
राह में मिल जाऊ एक दिन
किसी भीड़ में जो मैं टकरा जाऊ
तुम से
कभी बारिश में जो मैं भीगकर घर
आ जाऊ तेरे एक दिन
कभी टूटे कांच की तरह मैं बिखर जाऊ
पानी में बहता जो मैं कभी
नदी की तरह
समंदर में मिल जाऊ एक दिन
कभी कटी पतंग सा
कही उड़ चलू एक दिन
वो मांझे की डोर हो तेरे हाथ में
तू ना दे जिसे कभी छूटने,

धूप से ढंके जो
वो ओढनी बन जाऊ मैं
तेरी एक दिन
एक आह उठती है फिर से
की जलते कदमो की तेरी मैं वो नमी
बन जाऊ एक दिन
उठाता हो जैसे कोई पत्थर सीने से
मैं वो पत्थर बन जाऊ एक दिन
तेरी राह की मैं वो सड़क बन जाऊ एक दिन
होता नहीं सवेरा मेने सूना है तेरे शहर में
मैं वो उगता सूरज बन जाऊ एक दिन
अँधेरे से फिर तू ना घबराना
मैं वो उजली किरण बन जाऊ एक दिन
चल फिर से वही
जहा मिले थे हम
बचपन की वो याद
वो गुड्डे गुड्डी की बारात
तुम दुल्हन
और मैं दूल्हा बन जाऊ एक दिन

©

राजा

तुम ऐसी ही तो अच्छी हो….

सुनों…….
तुम ऐसी ही तो अच्छी हों
वो तुम्हारे कानों के झुमके
नही लूट पाये दिल हमारा
पर वो माथे की बिंदी तुम्हारी
कई दफा मेरी आँखो में डूब गयी थी
जैसे बारिश आ जाने पर डूब जाती हैं वो नदियाँ
किसी समुन्द्र में
जैसे बहने लगते है पहाड़ो से वो झरने
कुछ उसी तरह तुम भी समा गयी हो मुझ में
यह पहली दफा ही हैं की कोई इतना हंसी लग गया
जैसे उस रोज जब बात हुई थी तुमसे पहली दफा
और मैं उस रात पूरे आसमां में खुद को तलाश रहा था किसी सितारे में
वो जो तुम अपने बायें पैर की अंगुलियो में लगा लेती हो नेलपॉलिश
और उस दायें पैर को छोड़ देती हो बेरंग सा
मैं वही रंग तो हूँ जो हर वक़्त रहना चाहता हूँ साथ तेरे
बिना उस रंग के जो दिखे जमाने को
कहने को तो हमने कई ख्वाब बुन लिए इन चन्द दिनों में
पर सुनों क्या वो ख्वाब पूरे होंगे
जो हमने देख लिए एक क्षण में
कई सारी बातें तो है जो
हम दोनों में एक सी हैं
पर तुम्हारा वो लड़कपन , वो बचकानी हरकतें
हर हाल में मुस्कुरा लेना
मेरे इश्क़ के नग़मे को
अपने उन हंसी के फव्वारों में उड़ा देना
अच्छा सुनो
बोहत है कुछ बताने को
कोई यू ही पहली दफा में नही बनाता अपने आने वाले बच्चो की माँ किसी को
हां तुम वही
सुनो
तुम ऐसी ही तो अच्छी हो …….😘

राजा

भौर की शुरुआत

मंद सी हवा चलती है

कभी तेज , कभी उमड़ती हुई

कोकिल के गीतों से

चिड़ियो की चहचाहट से

नभ में विचरण करते उन

पक्षियों की बातों से

लालिमा जब छा जाती है ।

पानी बर्फ सा , सुबह की रोशनी में

जगमगाता है

धूल की लहरें , वो मुझे नहला जाती है।।

रंग गेरुआं नभ में छाने लगता है

जब भौर अपने उन्माद में आने लगता है।

में उठ खड़ा होता हूँ

हर किरण के साथ में दौड़ पड़ता हूँ

भौर की जब शुरूआत होती है

एक लालिमा नभ में छा जाती है ।।

बरसात

सुनो इस बार बरसात में
तुम आना गाँव मेरे
कई साल हो गए है
तुम्हे देखे हुए भी
वो गाँव का बरगद
वही खड़ा है
पर थोड़ा बूढ़ा हो गया है
पर जब उसकी वो निकली जड़े पकड़ कर में खाती हूँ झूला
वो गिरने नही देता आज भी मुझे
पकड़े रखता है हाथ मेरा
तुम्हारी तरह ?
खैर तुमने तो छोड़ दिया था
वो हाथ बीच राह में
पर तुम आना इस बार बरसात में
वो मिट्टी जब भीग जाएगी बरसात में
तुम महसूस करना उसकी महक को , उसकी वो सौंधी खुशबू
जब दोपहर में
तुम कर रहे होंगे खेत में काम ,
मैं ,रोटी, वो मखन वाली छाछ और लेकर आउंगी प्याज
हां पता है अब तुम्हे यह सब नही लगेगा अच्छा
पर तुम खा लोगों यह भी जानती हूँ ।
सुनो तुम आना इस बार बरसात में
गाँव अब कुछ छोटा हो गया है
घर जो सबके बड़े हो गए है
पर लोग वही है आज भी
माँ आज भी गाँव वालो से दूध के पैसे नही लेती
और हरिया काका आज भी वही कहानियां सुनाया करते है जब वो आजादी की लड़ाई मे गए थे
बोहत कुछ बदल तो गया है गाँव में
हर घर की छत पर अब वो मिर्ची , सब्जिया नही सुखाई जाती
अब दूर से ही गाँव की छतो पर वो तुम्हारे शहर की छतरी नुमा टीवी के लिए डिस कनेक्शन लगा हुआ दिख जाता है
पर वो तुम्हारी शर्ट उस सरकारी स्कूल की आज भी रखी है मेरे पास संभाल कर
जिसे मैं आज भी कभी कभी रात में अपने मुँह पर ओढ़ लेती हूँ
ताकि तुम्हारी बाहों की कमी पूरी हो जाए
सुनो तुम आना इस बार बरसात में
कुछ कहानियां पूरी करनी है जहाँ से तुम छोड़ गए थे
सुनो तुम आना ………..

लेखकः अजनबी राजा

मजदूर दिवस

मजदूर दिवस

हम मेहनतकश लोग
धरा की छाती पर उग आये उन
पत्थरों को ढोते है ।

हम मेहनतकश लोग
कुदाल ,फावड़ों , से
सुबह – शाम दो – दो हाथ होते है ।

हम मेहनतकश लोग
दिनभर की थकान के बाद
सर्द रात भी चैन की नींद सोते है ।

हम मेहनतकश लोग
महंगे महल बनाकर
एक छप्पर की झोंपड़ी में सपने संजोते है

हम मेहनतकश लोग
दिन भर के मेहनताने में
दो वक़्त रोटी और सारे आसमां के चाँद – तारे
बटोरते है ।

हम मेहनतकश लोग …….

लेखकः अजनबी राजा