एक अधूरी बात

कभी जो अंधेरो मे मिल जाते हो

बेख़याली मे जो मेरी रूह मे उतर जाते हो

बताते फिर क्यों नही तुम

कहा फिर अचानक छोड़ मझधार में यू चले जाते हो ।

सर्द रातो मे सिरहन सी बढ़ जाती है

आती नही फिर कोई गर्मी की फुहार

किताबे ओर मेरी फिर ज़िद बढ़ जाती है

टूटते तारो के संग लगती है शर्ते

ओर ख्वाहिशों की तादादे बढ़ जाती है ।

रेत सी कभी फिसलती है ज़िन्दगी

कभी बंद मुठी में ही कैद हो जाती है ।

उभरकर आती है तकलीफ़े , कुछ पीर दिल के

सांझ ढले कभी लटकता हो जैसे चाँद खिड़की पर

आखरी हो पड़ाव जैसे ।

आता नही जब लौटकर कोई जहनुम से

तुम मेरी वही किताब हो

जो अभी अधूरी है ।

जिनके हर्फ़ बस इंतज़ार कर रहे है , तेरे लब कब उन्हें पढ़े , कब वो किसी की दुल्हन की तरह सजे ।

अजनबी राजा

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वर्चुअल दुनियां

आजकल सब ऑनलाइन हो गए, प्यार ,दोस्ती , नफरत, बचपन, वो कहानियाँ दादी -नानी की , वो खेलते जब मिट्टी मैं हम ।

सब कुछ खो सा गया है ।

वो जब स्कूल मे थे ड्रॉइंग की बुक से फाड़ पन्ने कार्ड बना दिया करते थे , आज तो बस एक मेसेज कॉपी करो ओर सबको चिपका दो ।

वो इश्क़ भी आजकल परवान कहा चढ़ता है जब किसी लाइब्रेरी मे किताबे उठाने – गिराने के बहाने इश्क़ की दास्तां लिखी जाती थी । आज सब ऑनलाइन ही मिल जाता है प्यार ,दोस्त रिस्ते हजार ओर फिर वही ब्रेकअप ओर रोना भी आजकल तो ऑनलाइन वाला हो गया । आँसू निकालने का वक़्त ही कहा अब तो , वो रोने वाली इमोजी भेज दो सामने वाला भी समझ जाता है की बंदा या बंदी रो रही है ।

बाबू ,सोनू , जानू ना जाने कितने काल्पनिक नाम हो गए है आज कल के इन वर्चुअल रिस्तो मे बस ओर कुछ महीनों का वो ऑनलाइन वाला रिस्ता एक दिन किसी ब्लॉक ऑप्शन का शिकार हो जाता है ।

यह बात अच्छी है लोगों का नजरिया बदल रहा है लेकिन कितना , जब आपके भाई की बर्थडे पार्टी हो ओर आप सब अपने अपने मोबाइल मे वस्त सब लाइक – कमेन्ट का जवाब तलब कर रहे हो । कितनी बार माँ ने कहा होगा की खाना खा ले लेकिन अभी अभी आया करते करते तुम उस से चैट करते हुए 2 घंटे गवां चुके थे , खाना ठंडा हो गया था ओर तुम अब मां को सुनाए जा रहे थे।

बाहर निकलो ना इस वर्चुअल दुनिया से , कभी फोन को बंद करके , पापा के पास बैठो , सुनो उनकी वो जवानी की कहानियां , जो उनके जेहन मे ही दफन है एक अरसे से ………

वो तुम्हारी लास्ट बेंच वाले दोस्त मिलो उनसे , कभी ऐसे ही पार्टी मना लो, एक केक लाकर क्या जायेगा 500 या 1000 में । लेकिन खुशियाँ , वो दिन बचपन के , वो क्लास के अंदर हल्ला मचाना , प्रेयर में कॉलर खड़ी रखना ….. समय देखो कितना भाग रहा , तुम सोच रहे हो अभी यही से हाय हेलो कर लेते फिर कहीं सेटल हो जाने पर मारेंगे गपशप ।

कुछ नही होगा बाद मे बस तुम फिर अपनी अपनी सैलेरी की बात करोगे , हाथ मे लेकर ऐपल 11 या 12 सेल्फी ले लोगे।

रात के 12 या 1 तो रोज बज जाते होंगे ना इस मोबाइल पर , चलो ना एक दिन 2 बजा ली जाये सब घरवालो के साथ बैठकर , सबकी बाते कर कर के ।

कभी पूछा है तुम ने पापा से की वो क्या हरकते करते थे , जब वो बच्चे थे………………………..😊😊

अजनबी

माँ

हां याद है मुझे जब छोटा था मैं , नही खाता था खाना ,माँ वो कटोरी लिए पीछे पीछे घूमा करती थी , बैठाती अपनी गोद मे फिर धीरे धीरे अपनी बातों मे , परियों की वो कहानियों मे उलझा कर मुझ को खाना खिलाया करती थी , जब एक दिन उस ज्वर ने मुझे जकड़ लिया था , माँ कितना रोई थी , बार बार देख मुझ को ,आँखे उसकी वो भर आई थी । बड़ा हुआ स्कूल में था जब ,घर आकर करता मे होमवर्क ,माँ पास आकर बैठ जाती थी मेरे , नही आती थी उसे पढ़नी वो किताबें पर वो उन किताबो को छू कर पढ़ना चाहती थी , बैठी रहती वही जब तक मे वो काम ना कर लेता , फिर ज्यादा होने पर उठा देती मुझ को , कहती थोड़ा बाद में कर लेना , अभी थक गया है । आ थोड़ा आराम कर ले…….

माँ …….जब मैं नही पहनता वो स्वेटर , कितना समझा कर पहना ही देती , लेकिन खुद रात को सारे वो झूठे बर्तन उसी ठंडे पानी से धोया करती । माँ जब वो बूढ़ी हो गई , पर अब भी वो मेरा ख्याल करती है ,आता नही हूँ जब तक ऑफिस से वो सोती नही । सर्द रातों मे वो उठकर आती है , अपने कमरे से मेरे कमरे तक , देखने यही के मेरी वो ओढ़ने वाली रजाई , सही ओढ़ रखी है के नही मेने , कई बार मेने यह महसूस किया जब वो मेरे मुँह पर रजाई नही होने पर वो अपनी सॉल रख जाती है ……….

माँ जब बूढ़ी हो जाती है …………….ओर भी प्यारी हो जाती है

……….माँ पर लिखना , दुनिया का सबसे कठिन कार्य है , क्यू की माँ की शब्दों में वाख्या नही हो सकती …………बस एक प्रयास किया है मेने ।।

लेखक

अजनबी राजा ।।

अधूरी हसरतें

बताना था तुम्हे की
मैं एक रोज मर जाऊँगा
तुम रहोगी जिंदा
देख रखे है यू तो ख्वाब मेने
पर तुम उन्हें पूरा करना
मैं जाना चाहता हूँ
एक बार उन पहाड़ियो में
जहाँ सुनाई देती है वो घंटियाँ
वो चहकते पक्षियो की आवाजें
जब सब शांत हो जाता है
उस नदी की तरह
जिसमे में एक दिन मांझी की तरह
चालाना चाहता था वो नाव
पर बारिश की उस शाम को
हा चलाई थी वो नाव कागज की
जैसे वो बनारस के घाट
जलते दीपों में जब नजर आ जाऊँगा
गंगा के घाट हा गया था
एक बार बस
फिर मन उठ सा गया
पता चला जब सब पवित्रता की
एक चादर ओढ़ रखे है
तुम से कहना था की
नज्में कुछ ओर लिखी है मेने
जब तुम उस रात ठंड के कारण
घर ना जा सकी
ओर तुम उस रात पवित्रता की आग मे
जलती रही …………..

अजनबी राजा

बीत गया ये साल भी

जनवरी बीत गई इस साल के उन ख्वाबो को सजाने में ही ।

फरवरी मे दिल फिर वही मोहब्बत वाले दिन याद कर कर रो रहा था ।

बीत गया वो होली वाला मार्च भी बेरंग सा हर बार की तरह ।

जब सब ठीक था तो एक दिन वो अप्रेल , मई की गर्मी झुलसा गयी मुझे ।

मैं वही उस तपती रेत पर अपना घर बनाए जा रहा था , लेकिन वो रेत का घर माँग रहा था , कुछ बारिश की बूंदे , जो तेरे शहर से आनी थी ।

आखिर मे वो जून के दिन कुछ ओर बीत जाने पर , जुलाई आ ही गयी ।

पर वो स्कूल की रेलमपेल ओर भागती ज़िन्दगी पता नही कब आजादी के उस अगस्त मे ले आई मुझे ।

सब मना रहे थे खुशियाँ आजादी की पर मे था , आज भी तेरी यादों मे वो जकड़ा हुआ एक उपनिवेश तेरी मोहब्बत का।

बारिश इस बार ना आ सकी कुछ जल्दी वो सितम्बर , अक्टूबर मे भीगा गई मुझे , पर मेरी आँखे अब भी प्यासी थी एक तेरे दीदार को ।

नवम्बर मे मैं फिर तुम्हे ढूंढ रहा था उन जलते दीपो की लो मे ओर एक पतंगे की तरह उस दीपक मे हवन हो रहा था मैं ।

सर्द राते जब आने लगी नजदीक , दिसम्बर मे फिर वो तेरी ठंडी यादे हर बार जुकाम लगाए जा रही थी मुझे …………………देखो ना ये साल भी बीत गया , बीते हो जैसे वो हमारी आखरी मुलाक़ात के बाद 5 साल ………………………………..

©

अजनबी राजा

दिसम्बर

…….

याद है अब भी वो मुझे जब 2012 की वो दिसम्बर की शाम को तुम ने जाते हुए कहा था , अब हम नही मिलेंगे फिर कभी , ओर मे उस स्वेटर को हाथ मे लिए घंटो वही खड़ा रहा , जो तुम लाई थी खुद बना के ।

आज जब 5 साल बाद फिर वही दिसम्बर जा रहा है वापस लेकिन मुझे याद दिलाता रहा हर वो दिसम्बर जब भी ठंड के कारण मे खुद को ही समेट लेता था । तुम्हरा वो स्वेटर आज भी वेसा ही चमकता है , हाँ जब तुम्हे छूने का मन हुआ , मेने उसे पहना है रूह की तरह , लेकिन अब वो अलमारी के दराज़ से झांकता है , वो पुकारता है मुझे लेकिन मैं नही जाता , मैं छुप जाता हूँ , तुम्हारी यादे , बेहद बेहया है , भागना चाहता हूँ मैं , लेकिन यह दिसम्बर मुझे खींच लाता है तुम तक, इन पाँच सालो मे, मेने नही खरीदा कोई भी नया स्वेटर , हर 4 दिन मे जुकाम लग जाता है । पूछते है घर वाले तो कह देता हूँ , एलर्जी से होता है , लेकिन नही बता पाता की वो ऐलर्जी तुम्हारी यादे है , ओर वो मुझे हर 4 दिन मे बीमार कर जाती है ।

अजनबी राजा

चाँद

कभी जो मे ना रहूँ

तुम चाँद को निहारा करना

पल भर याद जो आ जाउ

तुम चाँद को पुकारा करना ।

लाख छुपाए

इश्क़ तुम दुनियां को बता देना

पूछे जब कोई नाम मेरा

तुम घर मेरा बता देना ।।

तस्वीर मांगे कोई मेरी जब तुमसे

तुम ईद का चाँद बता देना

होली पर रंगों मे ढूंढना तुम मुझ को

कभी सेवैयों की महक मे दिख जाऊँगा

गली जब सज रही हो दिवाली के दीपक से

तुम मुझ को किसी एक दीपक मे ढूंढना ।।

बात बात पर रोना मत

याद आऊँगा , पर किसी ओर की तुम होना मत

ये ज़माना हज़ार लहजे सुनाएगा तुम को

तुम दिल की आरजू सुनना ।

धड़कनो की तुम वो कहानियाँ सुनना ।।

जब कभी तुम देखोगी सीरत मेरी

मैं मुस्कुराता हुआ नजर आऊँगा

देखना आसमां में , मैं चाँद नजर आऊँगा ।।

अजनबी राजा