आजादी मनाते है

चलो आज़ादी आयी है
आज़ादी के गीत गाते है
घर अपना थोड़ा बिखरा पड़ा है
उसे थोड़ा सजाते है

वीर आएंगे मेरे घर भी
थोड़ी मिट्टी उस कांच के फर्श पर लगाते है
तिरंगा लाओ कोई
घर के बाहर लगाते है

सीने में देशभक्ति की एक लो जगाते है
थोड़ा मुस्कुराते है
चलो आज़ादी आयी है
आजादी के गीत गाते है

सड़क किनारे तिरंगे बेचते उन बच्चो से
सारे तिरंगे ऊँचे दाम में खरीद लाते है
चलो आज़ादी मनाते है

बुलाते है उन बलात्कारियो को
उन आंतकवादियो को
बताते है उन्हें भी
होती क्या है देशभक्ति

बुलाते है चलो
उन जातिवादियो को
सुनाते है उन्हें भी उन वीरो की कहानियाँ जातिवाद से परे थी
जिनकी अपनी निशानियां

चलो बुलाते है
उन कट्टरपंथियों को
जलाते है जो बस्तियाँ अक्सर
देश के नाम पर
मज़हब के ईमान पर
उन्हें दिखाते है
वो लहू से लथपथ निशानियां

सुनाते है उन्हें वो

ललकारते इंकलाब के नारे
भागते वो अंग्रेज बेचारे
चलो आजादी आयी है
आजादी के गीत गाते है

भ्रष्टाचार के इस दौर में
हम भारत को स्वच्छ बनाते है

पेड़ो से झूलते किसानों को
कर्ज में दबे खेत -खलिहानों को
उन साहूकारों से छुड़ाते है
चलो हम आजादी मनाते है

भीम के प्रावधानों को
संविधान के सम्मानों को
चलो घर घर
शिक्षा का पानी घोल आते है

हम आजादी मनाते है
हम आजादी के गीत गाते है
जय हिंद

लेखक

©
अजनबी राजा

स्वतंत्रता

” स्वतंत्रता ”
कही खो गयी है
जो मिली थी
कुर्बानियों से
वीरो की जवानियों से
बढ़ते कदम तले
ठोकरों की निशानियों से

” स्वतंत्रता”
कही खो गयी है
हिन्दू -मुस्लिम के फसानों में
भड़कते दंगो के फसादों में
जो मिली थी
लाखों खून के बहाने से
सुहागिनों के उजड़े मकानों से

” स्वतंत्रता ”
कही खो गयी है
जातियों के बंटवारों में
राजनीती के नारों में
जो मिली थी
लड़ते -मरते उन
शहीदों के नारों से “

स्वतंत्रता ”
कही खो गयी है
भूख मरी के गलियारों में
महँगाई के इन बाज़ारो में
जो मिली थी
गोरों के ठिकानो से
लड़ते उन काले जवानों को

” स्वतंत्रता ”
कही खो गयी है
आज के अखबारों में
बढ़ते नारी पर अत्याचारों में
जो मिली थी
झाँसी के बलिदानों से
लड़ती उस मर्दानी नारी को

” स्वतंत्रता ”
कहीं खो गयी है
लड़की और लड़को के बंटवारों में
कन्या भूर्ण के हत्यारों में
जो मिली थी
भगत सिंह के ललकारों से
आज़ाद की गोली की आवाजों से

” स्वतंत्रता ”
कही खो गयी है
बड़ती इस भीड़ में
पाश्चात्य की इस दौड़ में
जो मिली थी
करघे को अपनाने से
नमक को घर घर का बनाने से

” स्वतंत्रता ”
कही खो गयी है
भ्रष्टाचार के घरों में
बदलते नोटों के रंगों में
जो मिली थी
कच्ची रोटियां पक्का कर
सीने पर हज़ार गोलियां खा कर

” स्वतंत्रता ”
कही खो गयी है
बड़ती मजहबो की भीड़ में
मंदिर – मस्ज़िद की नींव में
जो मिली थी
भाईचारे के उस नारे में
हिन्दू -मुस्लिम के बंटवारे में

” स्वतंत्रता ”
कही खो गयी है
संविधान के अपमानों में
बदलते प्रावधानों में
जो मिली थी सदियों की गुलामी
से दो सौ सालों की उस लड़ाई में

में ढूंढ़ता हूँ
वो
हिन्दू -मुस्लिम
सिख – ईसाई
थे जो आपस में भाई
जो करते थे भारत माँ की बढ़ाई
मर मिटते तिरंगे की आन में
तिरंगे की उस शान में
जय हिन्द
लेखक
©
अजनबी राजा

आखिर प्रेम क्या है ??


एक लड़की और एक लड़के के दरमियाँ जो है 

क्या वही इश्क़ है , 

  उनकी वो चाहते 

क्या वही प्रेम है 

 उनकी वो बचकानी हरकते 

  क्या वही मोहब्बत है 

रात भर जाग कर बाते करने की वो हसरते 

 क्या वही प्रेमरंग है 

उनकी वो तस्वीरे 

  वो अजीब हरकते 

वो लम्हे इश्क़ के 

  क्या वही इश्क़ है 


इश्क़ की एक पहेली , कितनी है 

  अजीब सी 

पता नही चलती कहा हो जाती है 


उल्फ़त के फिर वही तराने है

  कल के बिछड़े आज वही यार पुराने है 

 

 उम्र तो बीत चली वक़्त के संग धीरे धीरे 

 अब जो बचा है वही नियती के फ़साने है 


 इश्क़ 

वो जो चैन छीन ले 

 जो ना दे रात भर सोने 


कब सुबह हो और आँखे देखे उसे एक पल ,

  बिछाये फिर वो नज़रो के बिछोने  


वो जो इश्क़ हुआ करता है 

 सोलह बरस की उम्र मैं 

   वो भड़कते बदन की प्यास होती है 


  इश्क़ तो वो है 

    जो 70 कि उम्र में भी , बालों में गजरा लगा रहा हो , 

    वो जो बारिश को छू नही सकता फिर भी 

   उसकी महक में खुद को महका रहा हो 

   

 वो चल नही सकता साथ , घड़ी भर 

 पर कंधा अपना , हर वक़्त आगे उसके लेकर चल रहा हो 


इश्क़ वो है 

  जिसमे ना कोई हवस है 

  ना कोई जिसमे सुंदरता का मैं । 


 केवल उसके एहसासों को 

  पल भर में पड़ ले 

 जो उस चाँद की तरह हो जो केवल शितलता प्रदान करे । 



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अजनबी राजा

बेटियाँ

“” बेटियाँ”” 

  एक चकोर की तरह होती है बेटियां 

 जो उड़ चल ऊँचे गगन में 

   छूना चाहती है उस चाँद को 
मिलो उस पार , उस अथाह समुन्द्र को 

 पार करना चाहती है बेटियां 

  

कोख़ में ही वो देख लेती है सपने हज़ार बेटियां 

  कहती नही कुछ पर ,सब बयां कर देती है बेटियाँ
चाहतो के समुन्द्र से निकलकर 

  अपने अरमानों का गला घोंटती है बेटियाँ 
 हिज़ाब में रखकर अपने सारे सपने 

 बंद आँखों से ये जहाँ देखती है बेटियाँ 

 

 बाल -विवाह की आड़ में कभी 

   बापू को गिरवी होने से बचाती है बेटियाँ 
 दहेज़ की आड़ में , जलती है बेटियाँ 

 घर आकर ना कुछ कहती है बेटियाँ 
लंबी उम्र की जिद्दोहत में , कई दफ़ा भूखी सो लेती है बेटियाँ 
घर से दूर कोसों , अपने मन को 

 समझा रो लेती है बेटियाँ 

 

राखी पर ही याद आती है जिनको अपनी बहने 

  वो ससुराल में ना जाने कितनी दफ़ा उनके नाम का व्रत रख लेती है बेटियाँ 
बड़ी समझदार होती है बेटियाँ 

  दो घरों को संभाल कर , फिर भी खुद को  अबला सुन सह लेती है बेटियाँ 
 बापू की इज़्ज़त 

   कहीं माँ का प्रतिरूप बन 

घर घर की कहानी बन जाती है बेटियाँ 
  ऐसी होती है बेटियाँ 
कोख़ में ही , खुद के अस्तित्व को पहचान लेती है बेटियाँ 

 

सचमुच , बड़ी समझदार होती है बेटियाँ

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अजनबी राजा 
9602923068

गुलज़ार

एक दिन मुझे गुलजार बनना है 

फूलों के संग बैठ एक हसीन ख़्वाब बनना है 

होती है आखिर केसी ये शब्दो की कहानियाँ

एक दिन किसी कहानी का वो अधूरा नाम बनना है 

मोहब्बत के अश्कों में भीगकर जो इश्क़ हो 

एक दिन उस चाहत का तलबगार बनना है 

इन हर्फ़ों से बुनकर , तेरे गले का हार बनना है 

एक दिन मुझे गुलज़ार बनना है 

भरी पड़ी है दवात यहाँ मेरे दर्द से 

कभी फ़ुर्सत मैं बैठ , उन कोरे सफो का प्यार बनना है 

टूटकर जो गिरी थी कभी तेरे हाथो की चूड़ियाँ 

मुझ को एक दिन तेरे हाथों मैं कंगनों का हार बनना है 

तन्हाई के आलम में , छम से गूँजा दे मेरे घर को 

मुझ को तेरे पायल की उस धुन का श्रृंगार बनना है 

एक दिन मुझ को गुलज़ार बनना है 

तेरे गालो की वो डिंपल वाली हँसी का इज़हार बनना है 

बुढ़ापे में ही सही , मुझ को तेरी आँखों का सरताज़ बनना है 

  एक दिन मुझ को गुलज़ार बनना है 



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अजनबी राजा

भटकर फिर से 

बड़े दिनों बाद निकले घर से 

  हाथ मे कलम ओर कुछ कोरे पन्ने लिए दिल के 

गली गली घूम लिए , बेक़दरो की तरह हो लिए 

 संभलने की तमाम कोशिशे जारी रही 

  हालात फिर भी वो हो गए 

  हम उनके दीदार में पलके बिछाए बैठे रहे 

   ओर वो किसी ओर संग हो लिए 

दिल को संभाला ही था 

आखिरी गली के छोर पर वो फिर हमारे हो गए 

  भटके , फिर हाथ थामे 

बारिश में भीगकर कुछ , हम भी 

 उन बूंदों के संग  रो लिए 

किसी ने देखा भी नही इस तरह हम 

भटककर फिर घर को हम हो लिए 

 

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अजनबी राजा 

तुम बदल गयी 

हालात वही हो गए 

 तुम मेरे ना सही फिर किसी के हो गए 

 

ख़त हज़ार लिखे उन पतो पर 

तेरे शहर के नाम फिर खो गए 
हालात फिर वही हो गए

तेरे आँशुओ के मोती टूट कर चूर हो गए 
याद होगा तुमको 

वो अल्हड़ जवानी थी 

 एक नए घर की कहानी थी 

मैं था अजनबी तेरी बस्ती में 

तू वहां की सहज़ादी थी 

 तेरे बदलते वो अल्फ़ाज़ 

  अधूरे खत हो गए 

सच मे तुम फिर बेवफ़ा हो गए 

मेरी भीगी पलके 

तेरे ख़तो को भीगा गयी 

हालात मेरे मुझ को 

किसी खंडहर सा बना गयी 

में ठहरा इश्क़ का फ़क़ीर 

 ओर मुझ को तू फिर किसी 


मज़ार का बना गयी 

 रेत की मानिद था में 

समझ के तू मुझ को रेगिस्ता 

 फिर क्यू काफ़िर बना गयी 

  पूछती है वो स्कूल की गलियां 

 तेरे लबो की वो हसीं 

 क्यू बेहया हो गयी 

 आती है इन रातो को तेरी यादे 

  फिर तू क्यू बेजुबां हो गयी 



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अजनबी राजा 




©

अजनबी राजा 

9602923068

❤ 💔 🌷🌷