पिता ….

मेरी बढ़ती उम्र
उनकी ढलती उम्र
मैं होता जवां
वो होते बूढ़े

ख्वाहिशें मेरी बढ़ती हुई
उम्मीदें उनकी मुझसे छत चढ़ती हुई
उनके माथे पर बढ़ती झुर्रियाँ
मेरे माथे पर बढ़ता तेज

कुछ इस तरह से
वो ढ़लते गए
मैं निखरता गया

वो खड़े रहें बरगद की तरह
मैं उनकी छाव तले खुद को गढ़ता गया
वो घर
मैं उनके आँगन का सितारा बनता गया

लेखकः अजनबी राजा

Advertisements

एक दिन….

एक दिन …….
चलते हुए जो मैं कभी
राह में मिल जाऊ एक दिन
किसी भीड़ में जो मैं टकरा जाऊ
तुम से
कभी बारिश में जो मैं भीगकर घर
आ जाऊ तेरे एक दिन
कभी टूटे कांच की तरह मैं बिखर जाऊ
पानी में बहता जो मैं कभी
नदी की तरह
समंदर में मिल जाऊ एक दिन
कभी कटी पतंग सा
कही उड़ चलू एक दिन
वो मांझे की डोर हो तेरे हाथ में
तू ना दे जिसे कभी छूटने,

धूप से ढंके जो
वो ओढनी बन जाऊ मैं
तेरी एक दिन
एक आह उठती है फिर से
की जलते कदमो की तेरी मैं वो नमी
बन जाऊ एक दिन
उठाता हो जैसे कोई पत्थर सीने से
मैं वो पत्थर बन जाऊ एक दिन
तेरी राह की मैं वो सड़क बन जाऊ एक दिन
होता नहीं सवेरा मेने सूना है तेरे शहर में
मैं वो उगता सूरज बन जाऊ एक दिन
अँधेरे से फिर तू ना घबराना
मैं वो उजली किरण बन जाऊ एक दिन
चल फिर से वही
जहा मिले थे हम
बचपन की वो याद
वो गुड्डे गुड्डी की बारात
तुम दुल्हन
और मैं दूल्हा बन जाऊ एक दिन

©

राजा

तुम ऐसी ही तो अच्छी हो….

सुनों…….
तुम ऐसी ही तो अच्छी हों
वो तुम्हारे कानों के झुमके
नही लूट पाये दिल हमारा
पर वो माथे की बिंदी तुम्हारी
कई दफा मेरी आँखो में डूब गयी थी
जैसे बारिश आ जाने पर डूब जाती हैं वो नदियाँ
किसी समुन्द्र में
जैसे बहने लगते है पहाड़ो से वो झरने
कुछ उसी तरह तुम भी समा गयी हो मुझ में
यह पहली दफा ही हैं की कोई इतना हंसी लग गया
जैसे उस रोज जब बात हुई थी तुमसे पहली दफा
और मैं उस रात पूरे आसमां में खुद को तलाश रहा था किसी सितारे में
वो जो तुम अपने बायें पैर की अंगुलियो में लगा लेती हो नेलपॉलिश
और उस दायें पैर को छोड़ देती हो बेरंग सा
मैं वही रंग तो हूँ जो हर वक़्त रहना चाहता हूँ साथ तेरे
बिना उस रंग के जो दिखे जमाने को
कहने को तो हमने कई ख्वाब बुन लिए इन चन्द दिनों में
पर सुनों क्या वो ख्वाब पूरे होंगे
जो हमने देख लिए एक क्षण में
कई सारी बातें तो है जो
हम दोनों में एक सी हैं
पर तुम्हारा वो लड़कपन , वो बचकानी हरकतें
हर हाल में मुस्कुरा लेना
मेरे इश्क़ के नग़मे को
अपने उन हंसी के फव्वारों में उड़ा देना
अच्छा सुनो
बोहत है कुछ बताने को
कोई यू ही पहली दफा में नही बनाता अपने आने वाले बच्चो की माँ किसी को
हां तुम वही
सुनो
तुम ऐसी ही तो अच्छी हो …….😘

राजा

भौर की शुरुआत

मंद सी हवा चलती है

कभी तेज , कभी उमड़ती हुई

कोकिल के गीतों से

चिड़ियो की चहचाहट से

नभ में विचरण करते उन

पक्षियों की बातों से

लालिमा जब छा जाती है ।

पानी बर्फ सा , सुबह की रोशनी में

जगमगाता है

धूल की लहरें , वो मुझे नहला जाती है।।

रंग गेरुआं नभ में छाने लगता है

जब भौर अपने उन्माद में आने लगता है।

में उठ खड़ा होता हूँ

हर किरण के साथ में दौड़ पड़ता हूँ

भौर की जब शुरूआत होती है

एक लालिमा नभ में छा जाती है ।।

बरसात

सुनो इस बार बरसात में
तुम आना गाँव मेरे
कई साल हो गए है
तुम्हे देखे हुए भी
वो गाँव का बरगद
वही खड़ा है
पर थोड़ा बूढ़ा हो गया है
पर जब उसकी वो निकली जड़े पकड़ कर में खाती हूँ झूला
वो गिरने नही देता आज भी मुझे
पकड़े रखता है हाथ मेरा
तुम्हारी तरह ?
खैर तुमने तो छोड़ दिया था
वो हाथ बीच राह में
पर तुम आना इस बार बरसात में
वो मिट्टी जब भीग जाएगी बरसात में
तुम महसूस करना उसकी महक को , उसकी वो सौंधी खुशबू
जब दोपहर में
तुम कर रहे होंगे खेत में काम ,
मैं ,रोटी, वो मखन वाली छाछ और लेकर आउंगी प्याज
हां पता है अब तुम्हे यह सब नही लगेगा अच्छा
पर तुम खा लोगों यह भी जानती हूँ ।
सुनो तुम आना इस बार बरसात में
गाँव अब कुछ छोटा हो गया है
घर जो सबके बड़े हो गए है
पर लोग वही है आज भी
माँ आज भी गाँव वालो से दूध के पैसे नही लेती
और हरिया काका आज भी वही कहानियां सुनाया करते है जब वो आजादी की लड़ाई मे गए थे
बोहत कुछ बदल तो गया है गाँव में
हर घर की छत पर अब वो मिर्ची , सब्जिया नही सुखाई जाती
अब दूर से ही गाँव की छतो पर वो तुम्हारे शहर की छतरी नुमा टीवी के लिए डिस कनेक्शन लगा हुआ दिख जाता है
पर वो तुम्हारी शर्ट उस सरकारी स्कूल की आज भी रखी है मेरे पास संभाल कर
जिसे मैं आज भी कभी कभी रात में अपने मुँह पर ओढ़ लेती हूँ
ताकि तुम्हारी बाहों की कमी पूरी हो जाए
सुनो तुम आना इस बार बरसात में
कुछ कहानियां पूरी करनी है जहाँ से तुम छोड़ गए थे
सुनो तुम आना ………..

लेखकः अजनबी राजा

मजदूर दिवस

मजदूर दिवस

हम मेहनतकश लोग
धरा की छाती पर उग आये उन
पत्थरों को ढोते है ।

हम मेहनतकश लोग
कुदाल ,फावड़ों , से
सुबह – शाम दो – दो हाथ होते है ।

हम मेहनतकश लोग
दिनभर की थकान के बाद
सर्द रात भी चैन की नींद सोते है ।

हम मेहनतकश लोग
महंगे महल बनाकर
एक छप्पर की झोंपड़ी में सपने संजोते है

हम मेहनतकश लोग
दिन भर के मेहनताने में
दो वक़्त रोटी और सारे आसमां के चाँद – तारे
बटोरते है ।

हम मेहनतकश लोग …….

लेखकः अजनबी राजा

एक खत कैदखाने से ……..

एक खत कैदखाने से ……
मैं बैठा हूँ इस चार दीवारी में
मैं अंधेरे के उजाले को देखता हूँ
कोई आठ गज ऊपर है एक
रौशनदान
आती है कभी एक किरण वहाँ से उजाले की
जो लेती आती है संग अपने उस सूर्य के तेज को ..
कब सुबह से शाम हुई
पूर्णिमा कभी देखी नही मेने
मैं महीने के तीसो दिन एक
अमावस देखता हूँ …….
मेरे मन के एक घरौंदे में
आती है वो हवाएं
बारीश की कभी बूंदे छू लेती है मुझे , जो गिरती है किसी प्रेम की तरह मुझ पर ……
मैं उन हवाओं से करता हूँ बाते
वो बूंदे बारिश की जो भीगा जाती है मुझे रूह तक
वो हवा ले आती है संग अपने
मेरे गाँव की उस मिट्टी को
वो मिट्टी जहाँ बचपन रमता था मेरा
जहाँ कच्चे पक्के वो यार थे
खेत में वो आम के बाग …..
मैं गीत वतन का गाया करता था , मैं खुद को भगत बुलाया करता था ……
आजादी हर साल आती है
ले आती है एक लड्डू यहाँ कुछ मीठा सा
पर मन भरता नही उन लुड्डूओ से
जो बताते है हर साल मेरे किसी के अधीन होने को ……
मैं एक खामोश पत्थर की मांनिद हर बार सवेरे धकेला जाता हूँ
उन लाखों पत्थरो के संग जहाँ
एक रोटी ,थोड़ी दाल के लिए ….
कई खून बहा लेते है वो मेरे
कैदखाने के यार
मैं कैदखाने से
पुकारता हूँ मेरे उन जीवन भर के सालों को
मेरे वो बच्चे जिनको पीठ पर लाद मुझे मेला दिखाना था
एक हाथ पकड़ मुझे कई बार उनके नन्हे हाथो को थामना था …….
वो सुहागिन , अब बूढ़ी हो गयी होगी , आँखे उसकी कुछ धुंदली हो गयी होगी …..
तंज कसता होगा वो करवाचौथ का चाँद उस पर
जब उसे उस दिन चाँद देखना गवांरा ना होगा
मैं कैदखाने से कुछ लिखता हूँ उस भीमकाय दीवार पर
उकेरता हूँ नक्स मैं एक स्वतन्त्र भारत का
मैं एक पराधीन …………..

लेखक
अजनबी राजा

एक खत ….. गृभगृह से

एक खत गृभगृह से …..
माँ मैं बेटी हूँ
मुझे बाहर मत आने दे
तु खुद ही गिर पड़ किसी सीढ़ी से
या कोई खा गोली मुझे तु गिरा दे
मैं देखती हूँ अंदर से यह सब
तेरी बेचेनी जो बढ़ने लगी है आज कल

देख उन मासूमो को
मैं देखती हूँ जब एक नवजात से लेकर एक अधेड़ तक
हो रहा है उसका चीर हरण
ना छोड़ रखा है कोई घर
ना कोई खंडहर, ना कोई मंदिर
माँ
किसके लिए रखे थे वो व्रत तुमने
जब उसी मूरत के समक्ष हो रहा था मेरी देह का हरण
कई बार मुझे निचोड़ा गया

मन जब भरा नही उनका तो पत्थरो से कुचला गया…

माँ

मुझे तु अंदर ही रहने दे , बाहर हाथ अब मेरी सलामती को नही आते , वो आते है देखने मेरी अस्मत को ,लूटने मेरे यौवन को….
माँ
अब कैसे करोगी तुम विदा मुझ को , जब आबरु मेरी यह पहले ही लूट लेंगे……..
बाबा ..
क्या इस हालात में तुम लेकर जाओगे मुझे कोई मेला घुमाने ,
जब उनकी नजरे तुम्हारे कंधो पर बैठी उस देह की केवल स्तनों ओर योनि को ताकती है । वो भेड़िये की तरह टूट पड़ती है मुझ पर उनकी आँखे जो देखती नही मेरा बचपन , जिन्हें दिखता है एक आठ साल की देह मे केवल यौवन
माँ
मुझे अंदर ही रहने दो……

लेखक
अजनबी राजा

नारी

नारी

देह उसकी नोचि जा रही
तार तार हुआ जा रहा है अंग उसका
क्या आठ ,क्या साठ
एक ही हवस मे देखी जा रही है हर ओर
त्राहि मचा रखी है हवस ने
कोन अब संभाले बेटियो को
कहीं घर , कही राह में
मंदिर कही , कही खंडहर में
देह उसकी कुचली जा रही है
कहते है भगवान जिसको
घर में उसके देह लूटी जा रही

नारी

चहकती ,दमकती , वो नारी
आज आबरु अपनी बचाती ,छुपा रही
सत्ता के लालसी कर रहे यह कर्म कांड
कानून की भी अब इसमे हिस्सेदारी आ रही

लेखक
अजनबी राजा

इंसानियत

इंसानियत
मरी पड़ी है आज
मोहनजोदड़ो के उस तालाब किनारे
जहाँ सालो पहले
मिली थी एक लाश महिला की
वो हड्डिया उन मजदूरों की …..
आज के इस दौर में

इंसानियत

कही पड़ी है किसी गड्ढे मे दफन होने को
कही पड़ी है उन लकड़ियों के ढेर पर
कोई आये ओर डाल दे कुछ मिट्टी
ले कोई जलती लो ओर भस्म कर दे उसकी देह को
मनुष्य आज
देखता है अपराध को धर्म से जोड़कर
ओर पूछती है कलम मेरी की
जन्म के उस वक़्त तुम किस धर्म के थे
खबर कहा तुमको यह
खैर की अब तुम्हारे नेत्रों पर एक चश्मा चढ़ा पढ़ा है धर्म का
जिन्हें आसिफा , ओर निर्भया ,डेल्टा
दिखती है पहले एक धर्म से
फिर दिखती है की वो थी एक स्त्री

इंसानियत

मरी पड़ी है …
उस जगह …..जहाँ निचोड़ा , रोंदा, कई बार हवस का भोगी बनाया गया उस को ….
जिसे पहले तुम धर्म की आँख से देखते हो
ओर कलम मेरी देखती है की वो थी एक बच्ची, एक लड़की , एक महिला साठ साल की ……..

लेखक —-अजनबी राजा