दीवाली

लौ जगी है हर गली में

रौशन आसमाँ चारों ओर हुआ है

देखा था कल अँधेरा जहाँ

आज उजाला हर ओर हुआ है

मिट्टी के वो दीये

कपास की जिनमे है सौंधी खुशबू

कुम्हार की वो घड़ाई

पसीने की है जिसमे मेहनत की वो सुगन्ध

जुगनुओं सा जगमगा रहा है देश अपना

दीपों ने फैलाया है उजियारा

अँधेरे को चीरता हुआ

वो बाण छुटा है नभ से

आकासगंगाओ से सट्टा है ये आसमाँ

हर ओर बस फैला है उजियारा

चलो इन अँधेरो को मिटाते है

एक दीप किसी उझाड़ घर में भी जलाते है

जाता नही जहाँ कोई उस खंडहर में

हम वहाँ दीप जलाते है

किसी गरीब के घर भी

इन दीपो की रौशनी जगमगाते है

फुलझड़ियाँ , घुमनचक्करी ,

कुछ मिठाइयां ले जाते है

लौ जगी है हर गली में

इनके घरों में भी दीप जलाते है

,,,,,,, चलो एक सार्थक दीवाली मनातेै है ,,,,,,,

कॉपी राईट

अजनबी राजा

9602923068

Advertisements

मेरा ख़ून और वो दाग

कुछ महफ़ीले यू ही खाक हुई

वो सुर्ख आंखे यू ही लाल हुई

लिखने का भला किस्से था तज़ुरबा

ये कलम तेरे इश्क मै यू ही बदनाम हुई

शाम के ढल जाने से खूल गये मेखाने

फिर आज तेरे ग़मो की वो बरसात हुई

लफ़्ज ठंड मै दम तोड़ गये

खत जो तुझे लिखे मेने कुछ अधुरे – कुछ पूरे

भरी महफ़ील मै वो यू बेनक़ाब हुए

उम्र भर इश्क था मेरा किसी अजनबी सा

ना जाने आज वो क्यू यू कोरे सफ़ो की तरह हो गया

तेरे जाने के निशां हर जगाह मिले

आने को तेरी एक गली ना मिली

शहर भर की बस्ती ने मारे पत्थर

ना जाने क्यू ये इश्क का दाग

मेरे ही खून से साफ़ हुआ

——–

कॉपी राइटर

अजनबी राजा

आख़िर कब तक

समाज का आईना

———- आखिर कब तक ——————- अख़बार उठाओ सूबह का , मानो खून से लथपत हो , हर जहग हवस के नर भक्षी भरे पड़े है । अरे जानवर भी इतना हैवान नही बनता ,और आज के ये संभ्य समाज के लोग , पता नहीं किस और जा रहे है , अभी हमारे नजदीक ही झवर नामक गाँव में , जहाँ एक लड़का लापता हो जाता है , और जब मिलता है , तो एक मूर्त अवस्था में और वो भी एक योन शोषण का शिकार , आखिर कैसे आज का मानव इतना ज़ालिम हुआ जा रहा है । हम आखिर किस समाज में जी रहे है , जहाँ बेटियां सुरक्षित नहीं , और ये नन्हें बचपन के पंछी , जिनकी अभी उड़ान तो बाकी थी , उन पर कैसे तुम अपनी ये हवस की आग बुजाते हो , धिक्कार है। तुम पर और उस समाज पर भी जो तुम जैसो को लेकर साथ चलता है । अरे हैवानों वो नन्हा बालक , कहाँ तुम्हारी अधेड़ जवानी का भार उठा पाया होगा , जो तुम उसकी देह के साथ खेलते रहे , दर्द कितना हुआ होगा उसे , जब उसके वो अध्पक्के अंग तुम्हारी वो आँखों की बढ़ती लालसा के आगे चीख़-पुकार रहे थे । ……कैसे तुम्हारी आत्मा मान गयी , आत्मा वो थी ही नही तुम्हारी ,वरना मज़ाल तुम ये गुनाह कर लेते । हमारा प्रशासन वाह उसके तो न्यारे भी अलग है , चाहे वो up के वो अगस्त में मरने वाले बच्चे हो या हक़ की आवाज उठाने वाले वो पत्रकार , सब एक ही थाली के चटेपटे है । कोई नही सुनता किसी की ,हाँ अगर वेतन की बात हो तो वो जरूर 7वे वेतन के चक्कर में सड़कों पर दिख जाएंगें । ……गुड़गांव. यहां के रेयान इंटरनेशनल स्कूल में 7 साल के बच्चे के मर्डर के आरोपी बस कंडक्टर अशोक ने गुनाह कबूल कर लिया है। और ये आज की घटना , कैसे कोई यार वो 7 साल बच्चा केसे तुम्हारी बुद्धि भ्रस्ट हो जाती है , कैसे तुम में ये हैवानियत जागती है ,क्यों तुम्हे तुम्हारा बचपन याद नहीं आया ,क्यूँ तुम्हे तुम्हारे बच्चे याद नहीं आते , जब तुम अपनी वो लार टपकती आँखों से उन्हें ताड़ते हो , क्यूँ तुम एक चंद मिनटों की प्यास को बुझाने के लिए , किसी के घर को उझाड़ जाते हो , क्यूँ नही सुन पाये तुम जब वो नन्हा , अपनी तुतलाती ज़बान से तुम को रिक्वेस्ट कर रहा था ,अंकल ऐसा मत करो ना , दर्द होता है अंकल , क्यूँ नही सुन पाते तुम उसकी वो कोयल सी मधुर आवाज को , कैसे तुम अंधे हो गए थे उस वक़्त , कैसे तुम ने वो सब्जी काटने वाले चाकू से तुम उसकी गर्दन काट आये , कैसे ????????? कोन करेगा यार भरोसा अब फिर बस चालक पर कोन भेजेगा अपने लाल को संग तुम्हारे , वो स्कूल , वो देवालय , कैसे तुम छूट पाओगे , उम्र कैद तो कुछ भी नही , तुम उस नन्हे बालक की आत्मा की कैद से कैसे छूट पाओगें , आखिर कब तक …………………..

कॉपी राईट

अजनबी राजा

आजादी मनाते है

चलो आज़ादी आयी है
आज़ादी के गीत गाते है
घर अपना थोड़ा बिखरा पड़ा है
उसे थोड़ा सजाते है

वीर आएंगे मेरे घर भी
थोड़ी मिट्टी उस कांच के फर्श पर लगाते है
तिरंगा लाओ कोई
घर के बाहर लगाते है

सीने में देशभक्ति की एक लो जगाते है
थोड़ा मुस्कुराते है
चलो आज़ादी आयी है
आजादी के गीत गाते है

सड़क किनारे तिरंगे बेचते उन बच्चो से
सारे तिरंगे ऊँचे दाम में खरीद लाते है
चलो आज़ादी मनाते है

बुलाते है उन बलात्कारियो को
उन आंतकवादियो को
बताते है उन्हें भी
होती क्या है देशभक्ति

बुलाते है चलो
उन जातिवादियो को
सुनाते है उन्हें भी उन वीरो की कहानियाँ जातिवाद से परे थी
जिनकी अपनी निशानियां

चलो बुलाते है
उन कट्टरपंथियों को
जलाते है जो बस्तियाँ अक्सर
देश के नाम पर
मज़हब के ईमान पर
उन्हें दिखाते है
वो लहू से लथपथ निशानियां

सुनाते है उन्हें वो

ललकारते इंकलाब के नारे
भागते वो अंग्रेज बेचारे
चलो आजादी आयी है
आजादी के गीत गाते है

भ्रष्टाचार के इस दौर में
हम भारत को स्वच्छ बनाते है

पेड़ो से झूलते किसानों को
कर्ज में दबे खेत -खलिहानों को
उन साहूकारों से छुड़ाते है
चलो हम आजादी मनाते है

भीम के प्रावधानों को
संविधान के सम्मानों को
चलो घर घर
शिक्षा का पानी घोल आते है

हम आजादी मनाते है
हम आजादी के गीत गाते है
जय हिंद

लेखक

©
अजनबी राजा

स्वतंत्रता

” स्वतंत्रता ”
कही खो गयी है
जो मिली थी
कुर्बानियों से
वीरो की जवानियों से
बढ़ते कदम तले
ठोकरों की निशानियों से

” स्वतंत्रता”
कही खो गयी है
हिन्दू -मुस्लिम के फसानों में
भड़कते दंगो के फसादों में
जो मिली थी
लाखों खून के बहाने से
सुहागिनों के उजड़े मकानों से

” स्वतंत्रता ”
कही खो गयी है
जातियों के बंटवारों में
राजनीती के नारों में
जो मिली थी
लड़ते -मरते उन
शहीदों के नारों से “

स्वतंत्रता ”
कही खो गयी है
भूख मरी के गलियारों में
महँगाई के इन बाज़ारो में
जो मिली थी
गोरों के ठिकानो से
लड़ते उन काले जवानों को

” स्वतंत्रता ”
कही खो गयी है
आज के अखबारों में
बढ़ते नारी पर अत्याचारों में
जो मिली थी
झाँसी के बलिदानों से
लड़ती उस मर्दानी नारी को

” स्वतंत्रता ”
कहीं खो गयी है
लड़की और लड़को के बंटवारों में
कन्या भूर्ण के हत्यारों में
जो मिली थी
भगत सिंह के ललकारों से
आज़ाद की गोली की आवाजों से

” स्वतंत्रता ”
कही खो गयी है
बड़ती इस भीड़ में
पाश्चात्य की इस दौड़ में
जो मिली थी
करघे को अपनाने से
नमक को घर घर का बनाने से

” स्वतंत्रता ”
कही खो गयी है
भ्रष्टाचार के घरों में
बदलते नोटों के रंगों में
जो मिली थी
कच्ची रोटियां पक्का कर
सीने पर हज़ार गोलियां खा कर

” स्वतंत्रता ”
कही खो गयी है
बड़ती मजहबो की भीड़ में
मंदिर – मस्ज़िद की नींव में
जो मिली थी
भाईचारे के उस नारे में
हिन्दू -मुस्लिम के बंटवारे में

” स्वतंत्रता ”
कही खो गयी है
संविधान के अपमानों में
बदलते प्रावधानों में
जो मिली थी सदियों की गुलामी
से दो सौ सालों की उस लड़ाई में

में ढूंढ़ता हूँ
वो
हिन्दू -मुस्लिम
सिख – ईसाई
थे जो आपस में भाई
जो करते थे भारत माँ की बढ़ाई
मर मिटते तिरंगे की आन में
तिरंगे की उस शान में
जय हिन्द
लेखक
©
अजनबी राजा

आखिर प्रेम क्या है ??

एक लड़की और एक लड़के के दरमियाँ जो है

क्या वही इश्क़ है ,

उनकी वो चाहते

क्या वही प्रेम है

उनकी वो बचकानी हरकते

क्या वही मोहब्बत है

रात भर जाग कर बाते करने की वो हसरते

क्या वही प्रेमरंग है

उनकी वो तस्वीरे

वो अजीब हरकते

वो लम्हे इश्क़ के

क्या वही इश्क़ है

इश्क़ की एक पहेली , कितनी है

अजीब सी

पता नही चलती कहा हो जाती है

उल्फ़त के फिर वही तराने है

कल के बिछड़े आज वही यार पुराने है

उम्र तो बीत चली वक़्त के संग धीरे धीरे

अब जो बचा है वही नियती के फ़साने है

इश्क़

वो जो चैन छीन ले

जो ना दे रात भर सोने

कब सुबह हो और आँखे देखे उसे एक पल ,

बिछाये फिर वो नज़रो के बिछोने

वो जो इश्क़ हुआ करता है

सोलह बरस की उम्र मैं

वो भड़कते बदन की प्यास होती है

इश्क़ तो वो है

जो 70 कि उम्र में भी , बालों में गजरा लगा रहा हो ,

वो जो बारिश को छू नही सकता फिर भी

उसकी महक में खुद को महका रहा हो

वो चल नही सकता साथ , घड़ी भर

पर कंधा अपना , हर वक़्त आगे उसके लेकर चल रहा हो

इश्क़ वो है

जिसमे ना कोई हवस है

ना कोई जिसमे सुंदरता का मैं ।

केवल उसके एहसासों को

पल भर में पड़ ले

जो उस चाँद की तरह हो जो केवल शितलता प्रदान करे ।

कॉपी राइट

अजनबी राजा

बेटियाँ

“” बेटियाँ”” 

  एक चकोर की तरह होती है बेटियां 

 जो उड़ चल ऊँचे गगन में 

   छूना चाहती है उस चाँद को 
मिलो उस पार , उस अथाह समुन्द्र को 

 पार करना चाहती है बेटियां 

  

कोख़ में ही वो देख लेती है सपने हज़ार बेटियां 

  कहती नही कुछ पर ,सब बयां कर देती है बेटियाँ
चाहतो के समुन्द्र से निकलकर 

  अपने अरमानों का गला घोंटती है बेटियाँ 
 हिज़ाब में रखकर अपने सारे सपने 

 बंद आँखों से ये जहाँ देखती है बेटियाँ 

 

 बाल -विवाह की आड़ में कभी 

   बापू को गिरवी होने से बचाती है बेटियाँ 
 दहेज़ की आड़ में , जलती है बेटियाँ 

 घर आकर ना कुछ कहती है बेटियाँ 
लंबी उम्र की जिद्दोहत में , कई दफ़ा भूखी सो लेती है बेटियाँ 
घर से दूर कोसों , अपने मन को 

 समझा रो लेती है बेटियाँ 

 

राखी पर ही याद आती है जिनको अपनी बहने 

  वो ससुराल में ना जाने कितनी दफ़ा उनके नाम का व्रत रख लेती है बेटियाँ 
बड़ी समझदार होती है बेटियाँ 

  दो घरों को संभाल कर , फिर भी खुद को  अबला सुन सह लेती है बेटियाँ 
 बापू की इज़्ज़त 

   कहीं माँ का प्रतिरूप बन 

घर घर की कहानी बन जाती है बेटियाँ 
  ऐसी होती है बेटियाँ 
कोख़ में ही , खुद के अस्तित्व को पहचान लेती है बेटियाँ 

 

सचमुच , बड़ी समझदार होती है बेटियाँ

कॉपी राइट 

अजनबी राजा 
9602923068